26 October, 2007

ख्वाब...

सिन्दूरी सुबह सुनहली होने लगी है
नींद से उठी हूँ अभी अभी मैं

भीगे भीगे हैं
खिड़की से नज़र आते शीशम के पेड़

धुली धुली सी है कमरे की हवा
और खिलखिला रहा है सामने के आईने में मेरा अक्स

जैसे किसी ने पेंट-ब्रुश उठा कर
मेरे हाथ में एक नयी लकीर बना दी है

ख्वाबों के रंग घुल गए फिजाओं में
खुशरंग सी कुछ खुशबुओं में लिपटी हुयी हूँ मैं

चूड़ियों की खनक है सिरहाने रखे तकिये पर
और जिंदगी के पहलू में …आज जागी हूँ मैं

10 comments:

  1. हर दिन नया सवेरा।

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  2. बढ़िया है ख्वाब, बधाई.

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  3. कविता में छंद एक बड़ी ज़रूरत है.
    चाहि मुक्त छंद लिख रहे हों तब भी छंद की गति तो होना चाहिये. थोड़ी कसावट चाहिये .

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  4. भाषा अच्छी है आपकी। हिंदी में और भी लिखें।

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  5. likhti rahiye,yahi aapko majbooti dega.

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  6. बड़ी प्यारी कविता है...
    सादर.

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  7. बहुत ही खूबसूरत एहसास लिए हुए कविता।

    सादर

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  8. वाह ...बहुत बढि़या।

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  9. धुली धुली सी है कमरे की हवा
    और खिलखिला रहा है सामने के आईने में मेरा अक्स

    जैसे किसी ने पेंट-ब्रुश उठा कर
    मेरे हाथ में एक नयी लकीर बना दी है

    और एक नई शुरुआत....

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